आलू की खेती के लिए 

आलू किसी भी अच्छी सींचीत मिट्टी मे उग सकते है क्योंकी ये ज़मीन के नीचे उगते है और ढ़िली मिट्टी में उन्हे फैलने में आसानी होती और सांस लेने में आसानी होती है मगर उन्हे गीली मिट्टी बिल्कुल भी पसन्द नहीं है क्योकी उसमें हवा का प्रवाह अच्छे से नहीं होता है जिससे उन्हे पोषक तत्व सोखने में परेशानी होती है ।

ज़मीन तैयार करना

ज़मीन तैयार करने के लिए सबसे पहले उसकी 2-3 बार गुड़ाई करके छोड़ देना चाहिए उसके बाद ज़मीन की जुताई करनी चाहिए ताकी पौधो को अच्छे से नमी मिल पाऐ।

कटाई और रख – रखाव

  • आलू की फसल 10 हफ्तो में तैयार हो जाती है । लगभग पर जुलाइ के महीने तक ।
  • आलूओं की कटाई किसी सुखे दिन में करनी चाहिए । खुदाई हलके हाथों से करनी चाहिए ताकी पौधो को कोई नुकसान न पहुँचे ।
  • लगभग सारे आलू पौधों के सुखने से पहले यानी लगभगलगभग अगस्त तक काट लेनी चाहिए वरना पौधे सड़ जाएगें।
  • आलूओं पर से सारी मिट्टी झाड़ देनी चाहिए और उसके बाद उन्हे ठण्ढ़ी और सुखी जगह पर जहाँ पर रोशनी न पहुँचे मतलब जहाँ सिर्फ अन्धेरा हो एसी जगह रखा जाना चाहिए।
  • आलूओ को कभी भी सेब के साथ नहीं रखना चाहिए क्योंकी उन से निकलने वाली इथाइलिन गैस से आलू सड़ सकते हैं।
  • आलू घर में उगाए गए हों या बाहर से खरीदे गए हो उन्हें तब तक न धोए जब तक आप उसका उसका उपयोग न कर रहें हों क्योंकी धोने से उनकी उम्र कम हो जाती है।

आमतौर पर आलूओं को कतार में उगाया जाता हैं । आलूओ के बीज़ों को 15 इंच के अन्तराल पर लगाया जाता हैं । और हर कतार के बीच का फर्क ढ़ाई से तीन फीट के बीच का होता हैं । यदी स्थान कम हो तो एक टीला बना कर उस पर आलू के पौधे उगाए जा सकते हैं । एक 3 से 4 फुट के व्यास वाले टीले पर 6 से 8 आलू के पौधे उगाए जा सकते हैं ।

पौधे लगाने से पहले मिट्टी की गुड़ाई अच्छे से कर लेनी चाहिए और खर पतवारों के साथ पत्थरो को भी बिन लेना चाहिए ताकी मिट्टी ढिली हो जाए और पौधो को उगने में आसानी हो सके।

पौधो को खाद से काफी फायदा पहुँचता है मगर ज़रूरत से ज्यादा खाद डालने से पौधे दागदार हो जाते है।

आलू की खेती और नव विचार

भारत की सरकारी नीतियां कहीं और विकसित होती है, जहाँ की भौतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियां भारत कीस्थितियो से काफी भिन्नहोती है एसे में इन समाधानो को अपनाने से  हमारी कृषि के लिए किए जाने वाले नवीन आविष्कारोंप्रभावित होते हैं ;ये समाधान लोगों और यहाँ की भौतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों केलिए प्रासंगिक नहीं होते है । इसके परिणाम स्वरूप कुछ नया करने का उत्साह नष्ट होता जा रहा है, और निर्भरता की भावना पैदा कर रहा है।

हालाँकी आवश्यकता आविष्कार की जननी है यह एक प्रसिद्ध कहावत है, लेकिन आसानी से आविष्कार शब्द नवाचार के द्वारा बदला जा सकता है। आज देश भर में नवीन आविष्कारकखुद के द्वाराअनुभव किये जा रही समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं।

वे वास्तविक जीवन रूपी अनुसंधान प्रयोगशालाओं में काम करते हैं, औरव्यावहारिक स्थितियों में जो समस्याएँ होती है उनका समाधान खोजने की कोशिश करते है।

जैसे – मिट्टी के बर्तन में संग्रहीत आलू बेहतर होते हैं ।

ग्रामीण भागों और वहां के लोगों के साथ बातचीत करने से पता चलता है की वहाँ लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न नए विचारों को जन्म दिया है।ऐसे भी लोग हैं, जो ज्यादा मुख्यधारा के बाजार को प्रभावित नहीं कर रहे हैं और किन्तु नवाचार कीखोज कोजारी रखने की कोशिश कर रहे है।

आलू की बुआई का उचित समय- 

यदी आलू की बुआई उचित समय पर न की जाय तो उसकी पैदावार सही नहीं होती है। आलू की बुआई ऐसे समय में करनी चाहीए जब तापमान अधिकतम 30 से 32 डिग़री हो और न्युनतम 18 से 20 डिग़री हो। भारत का क्षेत्र विस्तरित है जिसकी वजह से भिन्न भिन्न स्थानों का तापमान भिन्न होता है ।

मिट्टी भरना

फसल की निराई के बाद ट्रैक्टर की सहायता से या स्वयं ही मिट्टी भरने का काम पुरा करें।

सींचाई

आलू के पौधे पौधारोपन के तुरंत बाद या 2-3 दिनों के बाद ( मिट्टी की नमी पर निर्भर करते हुए ) रोशनी और सींचाई का प्रति उत्तर देना शुरू कर देतें हैं । मिट्टी की संरचना और तापमान के अनुसार आम तोर पर 3 से 5 सींचाईया काफी होती हैं ।

ज़रूरत से अधिक सींचाई नहीं करनी चाहिए वरना पौधो को नुकसान पहुँच सकता है ।