जाने गेहूं की बेस्ट खेती कैसे करे ?

गेहूं की उन्नत खेती

पूर्वी उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में रबी की फसल में गेहूं की खेती की प्रधानता रहती है। इसकी वैज्ञानिक खेती की कृषि विधियां इस
प्रकार हैं –

खेत की तैयारी

उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में गेहूं की बुआई अधिकतर धान के बाद की जाती है। इस कारण गेहूं की बुआई में देर हो जाती है। अतः धान की समय से रोपाई या बुआई की जानी चाहिए जिससे गेहूं के लिए खेत अक्टूबर में खाली हो सके धान में पडलिंग या लेव लगाने से  भूमि कठोर हो जाती है। अतः भारी भूमि में पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई के बाद डिस्क हैरो से कम से कम दो बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाकर ही गेहूं की बुआई करना उचित होता है। डिस्क हैरो के प्रयोग से धान  में ठूठ छोटे-छोटे टुकड़ों में कट जाते हैं। इन्हें शीघ्र सड़ाने हेतु १५  – २० किग्रा नत्रजन (युरिया के रूप में) प्रति हेक्टेयर खेत को तैयार करते समय अवश्य दे देना चाहिए।

बोआई

खेत में उचित नमी होने पर ही बोआई देशी हल से अथवा सीड. कम-फटड्रिल से करें। पलेवा करके ही बोना श्रेयस्कर होता है। बीज को १८-२२ सेमी की दूरी पर बनी पंक्तियों में ५-७ सेमी की गहराई में बोना चाहिए। समय से बोआई के लिये १०० किग्रा० तथा विलम्ब से बोआई करने पर १२५ किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें। बीज को बोने से पहले प्रति किग्रा बीज को ३ ग्राम पारायुक्त रसायन या २.५ ग्राम थीरम से उपचारित किया जाना चाहिए। देर से बोई जाने वाली सभी किस्में २० नवम्बर से ३० नवम्बर तक बोने पर अधिक पैदावार देती हैं और देरी से बोने पर उपज में प्रतिदिन २० से ३० किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से गिरावट होती है। दिसम्बर के अन्तिम तथा जनवरी के प्रथम पखवारे में बोने पर पैदावार घट कर लगभग आधी रह जाती। है । ध्यान रहे कि कल्ले निकलने के बाद प्रति वर्ग मीटर ४००-५००
बालीयुक्त पौधे अवश्य हों अन्यथा उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा।
विलम्ब से बोआई-धान की कटाई देर से होने के नाते तथा तोरिया, आलु गन्ना की पेड़ी एवं शीघ्र पकने वाली अरहर के बाद गेहूं की खेती किये जाने पर अक्सर बोआई देर से होती है। ऐसी परिस्थिति में १. पिछेती बोआई हेतु संस्तुत प्रजाति का ही चयन किया जाय ।।
२. बीज दर १२५ किग्रा प्रति हेक्टेयर एवं उर्वरक संतुलित मात्रा में (८० ४० ३०) अवश्य प्रयोग करें। ३, बीज को रात भर पानी में भिगोकर उचित मृदा नमी पर बोयें। ४. पंक्तियों की दूरी को घटाकर १५ से १८ सेमी कर दें। ५. पिछेती गेहूं में सामान्य की अपेक्षा जल्दी-जल्दी सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई जमाव के १५-२० दिन बाद करके टापड्रेसिंग करें। बाद की सिंचाई १५-२० दिन के अन्तराल पर करें ।बाली निकलने से दुग्धावस्था तक फसल को जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्धरहे। इस अवधि में जल की कमी को उपज पर विशेष कुप्रभाव पड़ता
है। सिंचाई हल्की करें।

उर्वरकों का प्रयोग

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए। बौने गेहूं की अच्छी उपज के लिए धान, मक्का, ज्वार, बाजरा की खरीफ
फसलों के बाद भूमि में १२० ६० ४० किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से क्रमशः नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश प्रयोग करना चाहिए। यदि खरीफ में खेत परती हो या दुलहनी अथवा हरी खाद की फसल बोई गई हो, तो उसमें ८०: ६० ४० किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से क्रमशः नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग उपयुक्त होगा। देशी उन्नत किस्मों जैसे के० ६८ आदि के लिए ६० ३०:३० किग्रा नाइट्रोजन फास्फोरस तथा पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
अब प्रायः भूमि में जिंक की कमी देखने में आ रही है। गेहूँ की बोआई के २०-३० दिन के मध्य में पहली सिंचाई के आस-पास पौधों
में जिंक की कमी के लक्षण प्रकट होते हैं, जो निम्न है

१. प्रभावित पौधे स्वस्थ पौधों की तुलना में बौने रह जाते हैं।

२. नई पत्तियों पर (३-४ पत्ती नीचे से इन्टर वेनल क्लोरोसिस पत्तियों की जड़ों से (बेस) प्रारम्भ होकर पत्तियों के ऊपर की तरफ बढ़ती है। भूमि     में अधिक जिंक की कमी होने की दशा में नई निकलती जाती हैं। हुई पत्तियाँ नहीं खुलती हैं और वहीं से पत्तियाँ झुक जाती हैं या टूट
३. इन्टरवेनल क्लोरोसिस (पीलापन) अधिक दिनों तक पत्तियों में बने रहने के कारण सूखकर भूरे रंग में परिवर्तित हो जाती हैं। जड़ों
का विकास रुक जाता है। परिणामतः उपज घट जाती है। यदि ये लक्षण हों, तो ५ किग्रा जिंक सल्फेट को २ प्रतिशत यूरिया के घोल के साथ मिलाकर ८०० लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर दो पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। यदि यूरिया खड़ी फसल में दी जा चुकी हैं, तो यूरिया के स्थान पर २.५ किग्रा बुझे हुये चूने के पानी (२.५ किग्रा बुझे हुये चूने को १० लीटर पानी में सायंकाल डाल देवें तथा दूसरे दिन प्रातःकाल इस पानी को निथार कर अलग कर लेवें तथा चूना फेंक देवें) का प्रयोग करना चाहिए। यह ध्यान रखें कि जिंक सल्फेट के साथ यूरिया अथवा बुझे हुये चूने के पानी को मिलाना अनिवार्य है। धान के खेत में पिछले वर्षों में यदि जिंक सल्फेट का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग के रूप में।
न किया गया हो और गेहूँ में कमी होने की आशंका हो तो २०-२५ किग्रा/हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग के रूप में करना
फास्फोरस की पूरी मात्रा तथा पोटाश की १/३ मात्रा बोआई के समय कूड़ों में बीज के नीचे देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी
चाहिए। बलुई, दोमट एवं बलुई भूड़ मिट्टी में नाइट्रोजन की १/३ मात्रा, मात्रा पहली सिंचाई (२०-२५ दिन) के बाद तथा बची हुई मात्रा दूसरी
सिंचाई के बाद देना चाहिए। ऐसी मिट्टियों में सिंचाई के बाद ही उर्वरक देना अधिक लाभप्रद होता है। जो कृषक केवल ४० किग्रा नाइट्रोजन तथा दो सिंचाई देने में सक्षम हों, वह भारी दोमट भूमि में सारी नाइट्रोजन बोअई के समय दें, किन्तु जहाँ हल्की दोमट भूमि हो, वहाँ नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के समय कूड़ों में प्रयोग करें और शेष आधी पहली सिंचाई पर टाप ड्रेसिंग करे।।

सिंचाई

सामान्यतः बौने गेहूं की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए हल्की भूमि में ५ सिंचाइयां निम्न अवस्थाओं पर देनी चाहिए। इन अवस्थाओं
पर जल की कमी का उपज पर भारी कुप्रभाव पड़ता है, परन्तु सिंचाई हल्की करें। पहली सिंचाई क्राउन-रूट अवस्था पर (बोआई के २०-२५ दिन बाद), दूसरी सिचाई कल्ले निकलते समय बोआई के ४०-४५ दिन वाट), तीसरी सिंचाई दीर्घ सन्धि अथवा गाँठे बनते समय (बोआई
के ६०-६५ दिन बाद), चौथी सिंचाई पुष्यावस्था (बोआई के ८०-८५ दिन बाद), पाँचवी सिंचाई दुग्धावस्था (बोआई के १००-१०५ दिन ।
बाद) तथा छठी सिंचाई दाना पकते समय (बोआई के ११५-१२० दिन बाद) करना चाहिए।
पूर्वी उत्तर प्रदेश की भूमि निचली एवं भारी मिट्टियों वाली है और उसमें जल निकास की समस्या अधिक है। ऐसी स्थिति में गेहूं फसल के लिए मृदा में उपलब्ध नमी के आधार पर २ से ४ सिंचाइयाँ पर्याप्त होती हैं। दो सिंचाईयां क्राउन रूट निकलने एवं फूल आने पर और ३ सिंचाइयाँ क्राउन रूट निकलने, बाली निकलने के पूर्व तथा दूध पहने पर तथा ४ सिंचाइयां क्राउन रूट निकलने, कल्ले फूटने, फूल आने तथा
दूध पकने पर करें । सिंचाई में निम्न बातों पर ध्यान दें।
१. बोआई से पहले खेत समतल करें।
२. बोआई के बाद खेत को मृदा एवं सिंचाई के साधन के अनुसार आवश्यक नाप की क्यारियों एवं पट्टियों में बाँट दें।
३. हल्की भूमि में आश्वस्त सिंचाई सुविधा होने पर सिंचाई हल्की  (लगभग ६ सेमी जल तथा दोमट व भारी दोमट भूमि में तथा सीमित
सिंचाई साधन की दशा में सिंचाई कुछ गहरी (प्रति सिंचाई लगभग ८ सेमी जल ) करें |

फसल सुरक्षा

१. बीज शोधन-रोगों की रोकथाम हेतु बीज का १ प्रतिशत पारायुक्त रसायन के ३ ग्राम या थीरम २.५ ग्राम या कैप्टान २ ग्राम
प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। अनावृत्त कण्डुआ की रोकथाम हेतु कार्बण्डाजिम अथवा कार्बोक्सिन के २.५ ग्राम प्रति
किग्रा बीज की दर से बीज शोधित करना चाहिए खड़ी फसल में से कण्डुआ ग्रस्त बालियों को जलाकर नष्ट कर देना चाहिए।

२. खरपतवार नियन्त्रण-चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ, हिरनखुरी, कृष्णनील, गजरी आदि को नष्ट करने के लिए बोआई के
३५-४० दिन के अन्दर ३.४-डी० सोडियम साल्ट ८० प्रतिशत की ६२५ ग्राम मात्रा को ६०० से ८०० लीटर पानी में घोलकर फ्लैटफैन
नाजिल से प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। यदि गेहूँ के साथ राई, सरसों, चना आदि फसलें बोई गई हैं, तो २,४-डी० प्रयोग नहीं
करना चाहिए। गेहूँसा (गेहूँ का मामा या गुल्ली डण्डा) तथा जंगली जई जो कि गेहूं के उत्पादन में एक समस्या है, को नष्ट करने के लिये आइसोप्रोट्युरान ५० प्रतिशत घुलनशील चूर्ण १.५ किग्रा. या आइसोप्रोट्युरान ७५ प्रतिशत घुलनशील चूर्ण १.० किग्रा. अथवा मेथाबेजथायोजुरान ७० प्रतिशत घुलनशील चूर्ण १.५ किग्रा को ५०० से ७०० लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के ३०-३५ दिन के अन्दर
अर्थात् फसल जब तीन चार पत्तियों की हो, तो करना चाहिए। गेहूँ की पहली सिंचाई के बाद जब खेत में पैर न पॅसे, तभी उक्त खरपतवारनाशक का छिड़काव करें। इस खरपतवारनाशक का छिड़काव एकसार किया जाना चाहिए। इसके लिए फ्लैट फैन नाजिल
का ही प्रयोग करें।

३. रोग

रतुआ तथा आल्टरनेरिया झुलसा रोग-रतुआ या गेरुई की फफूदी। के पीले भूरे अथवा काले रंग के फफोले पत्तियों पर पड़ जाते हैं जो बाद में पूरी पत्ती पर दिखाई देते हैं। अल्टरनेरिया झुलसा रोग में कुछ। पीले व कुछ भूरापन लिए हुए गोलाकार धब्बे पहले निचली पत्तियों पर दिखाई देते हैं। ये धब्बे बाद में किनारों पर कत्थई भूरे रंग के तथा बीच में हल्के भूरे रंग के हो जाते हैं। इन रोगों की रोकथाम हेतु रोग के दिखाई देते ही जिंक मैंगनीज कार्बोनेट २ किग्रा या जीरम ८००१ किग्रा या जिनेब ७५% की २.५ किग्रा मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें आवश्यकतानुसार छिड़काव १०-१५ दिन के अन्तर पर पुनः करें।

गेहूँ का सेहूँ (इयर काकेले रोग-यह रोग ऍग्वीना ट्रीटीसी ना सूत्र-कृमि द्वारा होता है। इस रोग के कारण पत्तियों पर जग सिकुड़न आ जाती है, बालियाँ घुमावदार टेढ़ी-मेढ़ी निकलती हैं, बाली में दानों की जगह काली-काली गाँठे बन जाती है। इन गाँठों में सूत्र कृमि के लाखा सुसुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। इन्हें जब नमी मिलती है। तब यह क्रियाशील होकर पौधों को रोग ग्रसित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बोआई के समय बीज को २% नमक के घोल में डाल दें, उसके पश्चात् जो काली गाँठे घोल की सतह पर तैरने लगे उन्हें छलनी द्वारा निकालकर नष्ट कर दें तथा नीचे बैठे हुए बीज को स्वच्छ पानी से दो या तीन बार धोकर छाया में सुखाकर बोने के काम में लें।

गेहूँ का तन्दू रोग–यह रोग एक सूत्र-कृमि एंग्वीना ट्रीटीसी तथा शुक्राणु कोराइनी वैक्टेरियम ट्रीटीसी के संयोग से उत्पन्न होता है। इस रोग के कारण जब पौधों में बालियाँ निकलने लगती हैं, उस समय बालियों से चिपचिपा पीले रंग का पदार्थ निकलता है, जिसके सूखने पर पूरी बाली पीली दिखाई देती है। इन बालियों में दाने नहीं बनते हैं। इसकी रोकथाम के लिए उसी विधि को प्रयोग में लाना लाभप्रद है जो कि इयर काकेल (सेहूँ) रोग के लिए बताई गयी है।

४. कीट

दीमक-इस कीट के नियन्त्रण के लिए खेत की 3न्तिम जुताई के समय बी० एच० सी० १०% चूर्ण ३० किग्रा या आल्ड्रिन ५% चूर्ण २५ किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में प्रयोग करना चाहिए या आल्ड्रिन ३० ई० सी० की ४०० मिली मात्रा ५ लीटर पानी में घोलकर १ कुन्तल बीज को बोने से २४ घण्टे पूर्व उपचारित कर लेने पर इस कीट द्वारा की जाने वाली हानि से बचा जा सकता है।

गुजिया-इस कीट के नियन्त्रण के लिए अन्तिम जुताई के समय बी०एच०सी० १०% धूल का, ३० किग्रा या आल्ड्रिन ५% धूल का २५ किग्रा भूमि में मिलाना चाहिए।

माहू-इस कीट के नियन्त्रण के लिए किसी भी दैहिक कीटनाशी जैसे डाईमेथोएट ३० ई०सी० या मिथाइल ओडिमेटान २५ ई०सी०
या थायोमिटान २५ ई०सी० १ लीटर या फासफेमिडान ८५ ई०सी०  २५० मिली को ८००-१००० लीटर पानी में घोलकर प्रति हे
की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कटाई

फसल की कटाई का सर्वाधिक उपयुक्त समय वह है जो दाने में १५ प्रतिशत नमी रह जाये।